शहरीकरण

4 से 54: भारत के अपशिष्ट प्रबंधन सुधार में क्या अच्छा और क्या बुरा

  • Blog Post Date 05 दिसंबर, 2025
  • दृष्टिकोण
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Oliver Harman

International Growth Centre

o.harman@lse.ac.uk

शहरों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए घरों के स्तर पर कचरे को अलग करना एक ज़रूरी कदम है, जिसके लिए लोगों के व्यवहार और नियमों में बदलाव लाना आवश्यक है। ओलिवर हरमन ने इस लेख के ज़रिए भारत में ठोस अपशिष्ट सुधार के मामले की जांच करते हुए दर्शाया है कि इस सन्दर्भ में आम तौर पर कौन-सा उपाय कारगर है और कौन-सा उल्टा पड़ता है।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन संबंधी अनुसंधान से एक पहेली सामने आई- दिल्ली के एक मोहल्ले में, एक द्विभाषी विवरणिका, टोकन प्रोत्साहन और दो कूड़ेदानों के उपयोग के लिए किए गए एक छोटे से ‘संवेदनशीलता अभियान के चलते एक ही सप्ताह में कचरे को घरेलू स्तर पर अलग करने की दर में 4% से 54% तक बढोत्तरी हुई। अगर लोगों का व्यवहार इतनी तेज़ी से बदल सकता है, तो पूरे शहर में इस तरह के लाभ प्राप्त करना इतना मुश्किल क्यों है?

संक्षिप्त जवाब यह है कि भारतीय शहर तब सफल होते हैं जब वे लोगों के सही व्यवहार को आसान, प्रत्यक्ष दिखने वाला और बनाए रखने लायक बनाते हैं। जब भी जन प्रणालियों के भरोसेमंद बनने से पहले नागरिकों से मुश्किल काम करने को कहा जाता है, सिस्टम लड़खड़ा जाते हैं। इसकी चर्चा हमें इस पैटर्न की ओर ले जाती है कि आखिर भारतीय सन्दर्भ में आम तौर पर कौन-सा उपाय कारगर रहता है और कौन-सा उल्टा पड़ता है।

सफल सिद्धांत

अनुपालन को आसान बनाएं

जहाँ कचरा उठाना और एक जगह एकत्रित करना प्रत्यक्ष रूप से आसान हो, वहाँ नागरिक नियमों का पालन करते हैं। योजना से बनी बस्तियों में यह अक्सर घरेलू स्टोरेज जैसा ही दिखता है, जिसमें गली या सड़क के किनारे से कचरा उठान की व्यवस्था होती है। घनी बस्तियों और मिक्स्ड-यूज़ वाली बस्तियों में भरोसेमंद उठान की व्यवस्था के साथ-साथ, सही जगह पर बने कॉमन पॉइंट होते हैं जिनसे सही स्थान पर कचरा फेंकने जाने के लिए चलने के समय में कमी होती है और सड़क के किनारे कचरा फेंकना कम हो जाता है। भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों से पता चलता है कि जैसे-जैसे शहर बढ़ते हैं और लैंडफिल और दूर जाने लगते हैं, अपशिष्ट के लिए बनाए गए ट्रांसफर स्टेशन महत्वपूर्ण बन जाते हैं जो ढुलाई की दूरी कम करते हैं और उठान की बड़ी गाड़ियों के इस्तेमाल को आसान बनाते हैं। मिला-जुला बेड़ा (गली के लिए छोटी गाड़ियाँ, मुख्य सड़कों के लिए बड़े ट्रक) मुश्किल से पहुँचने वाली गलियों तक पहुँच को बढ़ाता है। इन उपायों से सही काम करने की लागत कम होती है।

नियमितता बनाए रखना

एक ऐसा टाइमटेबल जिसके हिसाब से लोग अपना समय और दिन तय कर सकें, न कि कभी-कभी किसी भी दिन आने-जाने के हिसाब से। इससे मिलकर काम करने की भावना बढ़ती है। लोग कचरा तभी अलग करते हैं जब उन्हें लगता है कि शहर की व्यवस्था वैसे ही उठाएगी जो वो छाँटते हैं और यह भरोसा नारों से ज़्यादा नियमित रहने से बनता है। सबूतों के आधार पर पूर्वानुमान को नियमों का पालन करने का एक सहज कारण बताया जाता है।

जब तक सब सामान्य न लगे, तब तक संचार बनाए रखना

दिल्ली में एक हफ़्ते का उछाल कोई अनोखी बात नहीं है। पटना में लोगों को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन  देने के छह महीने बाद कचरा अलग करने की दर दोगुनी से ज़्यादा हो गई। इंदौर शहर ने संचार को एक स्थाई सार्वजनिक सेवा के रूप में मान लिया है, जिसमें सड़कों, स्कूलों और मीडिया के माध्यम से आसान नियमों और गर्व से भरे संकेत दर्शाए गए हैं। जानकारी और दृश्यता का यह सातत्य मनुष्य के व्यवहार को ‘एक और काम के विचार से हम जैसे लोग यहाँ क्या करते हैं की सोच की ओर ले जाता है। ज़रूरी बात यह है कि सफल भारतीय मुहिमों ने संदेश को ऐसी सेवा के साथ जोड़ा जिसे लोग देख सके, अपना सके और उस पर भरोसा कर सकें। कुछ अनुमान दर्शाते हैं कि जब शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम एक साथ अच्छी तरह से काम करते हैं, तो कम गंदगी, आसान रूटिंग और पैसे देने की ज़्यादा इच्छा के चलते कुल म्युनिसिपल ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (एसडब्ल्यूएम) का खर्च 40% तक कम हो सकता है।

पहले से मौजूद प्रणाली के तहत काम करना

भारत के अनौपचारिक कलेक्टर और कचरा बीनने वाले उन इलाकों में आखिरी मील तक पहुँच और कम लागत में कचरा उठाने का काम करते हैं, जहाँ औपचारिक रास्ते मुश्किल होते हैं। जहाँ शहरों ने इस क्षमता को पहचाना और व्यवस्थित किया है, उदाहरण के लिए, पुणे शहर का कचरा बीनने वालों के यूनियन के साथ जुड़ाव, वहाँ आमतौर पर शुरू से एक व्यवस्था बनाने की तुलना में कम वित्तीय लागत पर कवरेज बेहतर हुआ है और आजीविका मजबूत हुई है। पैटर्न में नियमितता है- घरों का रजिस्ट्रेशन, व्यक्तिगत स्वच्छता उपकरण (पीपीई), रूट का बाकायदा कोऑर्डिनेशन और जो वस्तुएं रीसायकल होने के लिए बिक सकती हों, उन्हें बेचने का अधिकार। ये सब उपाय किसी भी टकराववाली स्थिति को एक सुनहरी जीत में बदल देते हैं।

जब तक भरोसा न बन जाए, भुगतान की दरों को सरल रखना

भारतीय नगर पालिकाओं को असली ‘कॉस्ट-रिकवरी’ दबाव का सामना करना पड़ता है (विकासशील देशों के शहरों में कचरा निपटान की लागत कुल ऑपरेटिंग बजट का लगभग पाँचवें भाग तक हो सकता है)। जब लोग देख पाते हैं कि वे किस काम के लिए भुगतान कर रहे हैं तो यह बात ज़्यादा असरदार होती। कम क्षमता वाले क्षेत्रों में मौजूदा बिल में कचरा प्रबंधन को शामिल करने से या एक मामूली फ्लैट चार्ज जोड़ने से अनुपालन हो सकता है। ऐसा इसलिए कि यह 'सब कुछ सही तरीके से करने' के लिए कोई मामूली जुर्माना नहीं है बल्कि सही काम को सही तरीके से करने की लागत है जो नज़र आती है। मॉनिटरिंग और बिलिंग के असल में कारगर हो जाने के बाद ज़्यादा उन्नत तरह के टैरिफ लाए जा सकते हैं।

आम रुकावटें

क्षमता से पहले जटिलता, आम विफलता का तरीका

असल में, पे-एज़-यू-थ्रो (पीएवाईटी) और ज़्यादा गेट फीस से, अवशिष्ट कचरे को कम किया जा सकता है। असल में, जहाँ मॉनिटरिंग और भरोसा कमज़ोर होता है, वहाँ लोग कचरे को अक्सर औपचारिक प्रणाली से बाहर, फुटपाथ पर, नालियों में, या इनफॉर्मल डंप में डाल देते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि कहीं भी फेंकना, डंपिंग, सबसे सस्ता विकल्प बन जाता है। तुलना-योग्य शहरों से मिले साक्ष्य दर्शाते हैं कि बिना भरोसेमंद तरीके से लागू किए ज़्यादा गेट फीस की वजह से छोटे मालवाहक आधिकारिक रूप से तय स्थानों से बचते हैं (कभी-कभी सिर्फ़ लम्बी कतारों से बचने के लिए), जबकि पे-एज़-यू-थ्रो स्कीम के लिए प्रशासन और सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होती है जो कई नगर पालिकाओं के पास अभी तक नहीं है।

फीडस्टॉक से आगे की टेक्नोलॉजी निराशाजनक बनी हुई है

कचरे को जलाना और कचरे से ऊर्जा बनाना स्लाइड डेक पर साफ-सुथरे लग सकते हैं, लेकिन ऐसी इकाईओं की लागत आमतौर पर रीसाइक्लिंग की तुलना में बहुत अधिक होती है और जिन संयंत्रों को को अपशिष्ट की लगातार सप्लाई की ज़रूरत होती है उनसे उपयोग योग्य सामान की पुनर्प्राप्ति बाधित हो सकती है। कंपोस्टिंग या एनारोबिक डाइजेशन भारतीय ऑर्गेनिक्स के लिए अच्छे हो सकते हैं, लेकिन सिर्फ़ तभी जब कचरा सही से छांटा गया हो और प्रवाह क्षमता (थ्रूपुट) विश्वसनीय हो। सफलता उन मामलों को मिलती है जिनमें उपकरणों, प्रणाली और व्यवस्था को सामग्री और ऑपरेटर की क्षमता से साथ सही मिलान किया जाता है। उन मामलों में विफलता ही हाथ लगती है जहाँ मशीनों, उपकरणों से कम्प्लायंस की समस्याओं के समाधान की अपेक्षा की जाती है। 

बिना दम वाले कॉन्ट्रैक्ट जारी करना- बार-बार होने वाला अपराध

जब जोखिम को ठीक से बांटा जाता है और करकरदगी को सटीक रूप में परिभाषित किया जाता है, तब पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) से पूंजी और अनुशासन दोनों आ जाता है। जहाँ ज़िम्मेदारियाँ साफ नहीं होतीं या जहाँ काम की निगरानी की क्षमता नहीं होती, वहाँ प्रोत्साहन लागत में कटौती की दिशा में जाते हैं, कवरेज फ़ायदेमंद इलाकों के पक्ष में झुक जाता है और लॉक-इन को खत्म करना महंगा हो जाता है। अन्य स्थानों के बेकार पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के गलत इस्तेमाल से मिले सबक भारत में बड़े काम का हैं। लाभकारी सहभागिता के मामले में समानता और सत्यापन के लिए पहले से उपयुक्त ढांचा बनाना होगा, नहीं तो पार्टनरशिप अपना ही कोई तर्क अपना लेगी।

सामाजिक संपर्क को अनदेखा करना

ये बातें लोगों की नज़र से नहीं छूटतीं कि क्या सुविधाएं रुक-रुक कर मिलती हैं, या फिर क्या छांटा हुआ कचरा बाद में दोबारा साथ मिलकर ढोया-निपटाया जाता है। ऐसे हालात में, जागरूकता की मुहीम कोरा लेक्चर प्रतीत होने लगते हैं। जिन शहरों में बदलाव आया है, इंदौर उनमें से एक है, जिसने नगर निगम के दिखने वाले काम को आसान, बार-बार दिए जाने वाले सन्देशों और सामुदायिक नेतृत्व के साथ जोड़ा। इससे सफाई का कार्य एक लीक से हटकर एक स्थानीय नियम सा बन गया।

यह पहेली हमें क्या सिखाती है?

दिल्ली का ‘4-से-54’ बढ़ोतरी वाला हफ़्ता दर्शाता है कि जब सफाई की बात हो और उनके आस-पास का सिस्टम सही लगे, तो लोग कितनी जल्दी प्रतिक्रिया दर्शाते हैं। बड़े पैमाने पर, यह पैटर्न दोहराने योग्य है : बुनियादी बातें सीधी, सरल और अंदाज़ा लगाने लायक हों, सन्देशों के ज़रिए व्यवहार को सामान्य करें ताकि नागरिक उसे कारगर होते हुए देख सकें, अनौपचारिक प्रणाली में पहले से मौजूद क्षमता का इस्तेमाल किया जाए और उसके बाद ही ऐसी शुल्क प्रणाली व तकनीकी तय की जाए जिससे बेहद अटल कम्प्लायंस कायम हो सके। जब भारतीय शहर ऐसी राह पर चल पड़ते हैं तब उपयुक्त औपचारिक प्रणाली सबसे कम रुकावट वाला रास्ता बन जाती है और बड़ी कारगर बन जाती है। लेकिन जब इसे उल्टा जाता है तब सिस्टम खामियों से भर जाता है।

यूएन-हैबिटैट के 'अर्बन अक्टूबर' के दौरान, आईजीसी ने शहरों में सतत विकास के कुछ समाधान प्रस्तुत किए। बेहतर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के नीतिगत विकल्पों के बारे में 'सिटीज़ दैट वर्क' के प्रमुख सिंथेसिस शोध पत्र में विस्तार से चर्चा उपलब्ध है। आप इसे पढ़ सकते हैं।

लेख में दर्शाए गए विचार लेखक के अपने हैं और ज़रूरी नहीं कि वे आई4आई सम्पादकीय बोर्ड के विचारों को दर्शाते हों।

अंग्रेज़ी के मूल लेख और संदर्भों की सूची के लिए कृपया यहां देखें।

लेखक परिचय :

ओलिवर हरमन इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर (आईजीसी) की 'शहर जो काम करते हैं' पहल के वरिष्ठ नीति अर्थशास्त्री हैं, जो कि लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस के अर्थशास्त्र विभाग में आधारित है। वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स और पॉलिटिकल साइंस और अफ्रीकन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के विभागों से भी जुड़े हुए हैं। उनके काम के बारे में www.oliverharman.me पर और अधिक जाना जा सकता है।

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