भारत भाषाई विविधता वाला एक देश है जहाँ देश के अंदर बहुत सारे लोग एक स्थान से दूसरे स्थान तक आते-जाते रहते हैं। इस इस लेख से पता चलता है कि किसी महिला की मूल भाषा और उसके निवास क्षेत्र की प्रमुख भाषा के बीच जितनी अधिक ‘भाषाई दूरी’ होगी, उसके स्वास्थ्य पर उतना ही बुरा असर होगा। साथ ही, ‘भाषाई दूरी’ का बच्चों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
सामाजिक मेलजोल को आकार देने और शिक्षा, रोज़गार और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुँच के माध्यम से आर्थिक अवसरों तक पहुँच को सक्षम बनाने की दिशा में भाषा की एक आधारभूत भूमिका होती है। एक ही भौगोलिक क्षेत्र में भी, संरचना और संयोजन के सन्दर्भ में भाषाएँ व्यापक रूप से भिन्न-भिन्न होती हैं। यहाँ तक कि और ये अंतर संचार और एकीकरण में बाधाएँ पैदा कर सकते हैं। ये बाधाएँ विशेष रूप से प्रवासियों के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनकी मूल भाषा अक्सर उस स्थान की प्रमुख भाषा से भिन्न होती है, जहाँ वे रहते हैं।
किसी नई भाषा को सीखने में किए गए निवेश पर प्रतिफल (रिटर्न) मिलने की सम्भावना अधिक है (चिसविक 2008, गिन्सबर्ग और वेबर 2020)। हालांकि, नई भाषा सीखना महंगा भी हो सकता है, और किसी व्यक्ति के लिए नई भाषा सीखने का खर्च, कुछ हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि सीखी जाने वाली नई भाषा, उसकी मातृभाषा से कितनी अलग है। अर्थात, भाषा की बाधा कितनी बड़ी है। प्रवासियों के लिए उनकी मूल भाषा उस क्षेत्र की प्रमुख भाषा से जिस क्षेत्र में वे रहते हैं, जितनी अधिक भिन्न होगी, सामाजिक-आर्थिक एकीकरण प्राप्त करने में उन्हें उतनी ही ज़्यादा लागत का सामना करना पड़ेगा।
भारत में 22 आधिकारिक भाषाओं और हज़ारों बोलियों के साथ बहुत बड़ी भाषाई विविधता है। स्थानीय प्रमुख भाषा की अच्छी जानकारी होने से लोग शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और श्रम बाज़ार तक पहुँच बनाने में सक्षम हो जाते हैं (लैटिन और रामचंद्रन 2016)। साथ ही, देश के भीतर बड़ी संख्या में आंतरिक प्रवासी (अस्थाई और मौसमी) भी हैं। 2011 की जनगणना के आँकड़ों से पता चलता है कि ग्रामीण-शहरी प्रवासियों की संख्या 5.1 करोड़ है। भाषाई विविधता की इस परिमाण को देखते हुए, यह सम्भव है कि किसी प्रवासी की मातृभाषा उस क्षेत्र की प्रमुख भाषा से भिन्न हो, जिससे मानव पूँजीगत परिणामों के सन्दर्भ में प्रवासियों पर लागत आ सकती है।
अपने अध्ययन (जयकुमार और शर्मा 2025) में हम स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच और उसके परिणामस्वरूप, स्वास्थ्य परिणामों पर भाषाई बाधाओं के प्रभावों की जाँच करते हैं। विशेष रूप से, हम किसी स्थानीय प्रमुख भाषा को सीखने की लागत में वृद्धि के, देखे गए स्वास्थ्य परिणामों और स्वास्थ्य-प्राप्ति व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभाव का अनुमान लगाते हैं। हम किसी भाषा को सीखने की लागत का पता लगाने के लिए, फ़ियरन (2003) द्वारा विकसित भाषाई दूरी (एलडी) के माप का उपयोग करते हैं।
भाषाई दूरी का मापन
भाषा 'क' बोलने वाले मूल व्यक्ति के लिए दूसरी भाषा 'ख' को सीखने की लागत सीधे तौर पर दोनों भाषाओं के बीच की विशिष्टता या भाषाई दूरी (एलडी) से संबंधित होती है। उदाहरण के लिए, तमिल और कन्नड़ जैसी भाषाओं के बीच भाषाई दूरी (एलडी) कम है, क्योंकि उनकी संरचना एक जैसी है, जिससे इनमें से एक भाषा बोलने वाले व्यक्ति के लिए लिए दूसरी भाषा सीखने की लागत कम हो जाती है। दूसरी ओर, तमिल और नेपाली के बीच भाषाई दूरी (एलडी) ज़्यादा है, क्योंकि ये दो बहुत अलग भाषाएँ हैं और इसलिए मूल भाषा बोलने वाले व्यक्ति के लिए दूसरी भाषा सीखने की लागत ज़्यादा हो जाती है। भाषाई दूरियों (एलडी) के मापन 'भाषा वृक्षों' पर निर्भर करते हैं, जिनमें अन्य मानदंडों के अलावा, वंश, उत्पत्ति और संरचना के आधार पर भाषाओं को वर्गीकृत और समूहीकृत किया जाता है। ऐसा ही एक भाषा वृक्ष एथनोलॉग (लुईस एवं अन्य 2014) है, जो विभिन्न भाषाओं के बीच संबंधों को दर्शाता है। विशेष रूप से यह कि कैसे भाषाएँ समान पूर्वजों से विकसित हुईं और समय के साथ विभिन्न शाखाओं में विभाजित हो गईं। हम जिस फियरन (2003) पद्धति का उपयोग करते हैं, उसमें भाषाई दूरी (एलडी) को यह तुलना कर के मापा जाता है कि दो भाषाएँ, वृक्षों की औसत गहराई के हिसाब से, अपने वर्गीकरण वृक्षों पर कितने नोड्स साझा करती हैं। पूर्वज या वंश जितने करीबी होंगे या जितने अधिक सांझा होंगे, दूरी उतनी ही कम होगी। फिर यह इस समानता को 0 (समान भाषा) और 1 (पूरी तरह से अलग भाषा) के बीच की दूरी में बदल देता है।
आकृति-1. भाषा वृक्ष
आँकड़े और अनुभवजन्य रणनीति
इस परिकल्पना की जाँच करने के लिए कि क्या बढ़ती हुई भाषाई दूरी (एलडी) का सम्बन्ध बिगड़ते स्वास्थ्य परिणामों से है, हम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के वर्ष 2015-16 (चौथे दौर) और वर्ष 2019-21 (पाँचवें दौर) में आयोजित दो सबसे हालिया दौरों के एकत्रित सर्वेक्षण आँकड़ों का उपयोग करते हैं। एकत्रित आँकड़ों में 15 से 49 वर्ष की आयु की 14,15,675 विशिष्ट महिलाएँ शामिल हैं। हम उन स्वास्थ्य परिणामों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो स्वास्थ्य सेवाओं से रोकथाम और उपचार संबंधी जानकारी प्राप्त करने पर प्रतिक्रिया देने की सम्भावना रखते हैं (उदाहरण के लिए, एनीमिया और उच्च रक्त शर्करा) और बच्चों में, विशेष रूप से पाँच वर्ष से कम आयु के लगभग 1,30,000-3,70,000 बच्चों के टीकाकरण दर पर भाषाई दूरी (एलडी) और स्वास्थ्य निवेश के बीच के संबंधों पर भी गौर करते हैं। हमारे आँकड़ों में भिन्नता का मुख्य स्रोत उत्तरदाता की मातृभाषा और जिले की प्रमुख भाषा के बीच की भाषाई दूरी (एलडी) है। हम 2011 की जनगणना से जिले की प्रमुख भाषा की पहचान, जिले में सबसे अधिक व्यक्तियों द्वारा बोली जाने वाली भाषा के रूप में करते हैं। उत्तरदाता की मातृभाषा और जिले की प्रमुख भाषा, दोनों के लिए इक्कीस आधिकारिक भाषाएँ दर्ज की गईं। इस प्रकार उत्तरदाता की मातृभाषा और प्रमुख भाषा के बीच की सभी सम्भावित बेमेल तत्वों को ध्यान में रखते हुए, भाषाओं के सभी जोड़े-वार संयोजनों के बीच फ़ियरन (2003) पद्धति का उपयोग करते हुए भाषाई दूरी (एलडी) की गणना की जाती है। फिर हम महिलाओं और उनके बच्चों में खराब स्वास्थ्य परिणामों की घटनाओं पर प्रमुख भाषा और मातृभाषा के बीच की भाषाई दूरी (एलडी) के प्रभाव का अनुमान लगाते हैं। हमारी विशिष्टता में पारिवारिक और व्यक्तिगत विशेषताओं और जिला-स्तरीय अंतरों की एक श्रृंखला का ध्यान रखा गया, और हम एक जैसे परिवारों की तुलना करते हैं जो क्षेत्र की प्रमुख भाषा से केवल अपनी भाषाई दूरी (एलडी) में भिन्न होते हैं। यह एक कारण-संबंध की पहचान के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारे विश्लेषण में प्रवासियों की तुलना गैर-प्रवासियों से प्रभावी रूप से की गई है।
अध्ययन के परिणाम
हमें इस बात के प्रमाण मिले हैं कि किसी महिला की मूल भाषा और उसके निवास स्थान की प्रमुख भाषा के बीच की भाषाई दूरी (एलडी) बढ़ने से उसके स्वास्थ्य संबंधी परिणाम खराब होते हैं। भाषाई दूरी (एलडी) में एक इकाई की वृद्धि से एनीमिया या उच्च रक्त शर्करा के स्तर की सम्भावना में 0.9-1.3 प्रतिशत अंक (पीपी) की वृद्धि होती है। हमें इन प्रवासियों के बच्चों के सन्दर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में कमी के प्रमाण भी मिले हैं- भाषाई दूरी (एलडी) में एक इकाई की वृद्धि, डीपीटी (डिप्थीरिया, पर्टुसिस और टेटनस), पोलियो, खसरा, पेंटावेलेंट, रोटावायरस, हेपेटाइटिस बी, विटामिन ए1 और विटामिन ए2 अनुपूरण जैसे नियमित टीकाकरण प्राप्त करने की सम्भावना में 3-6.9 प्रतिशत अंक की कमी से जुड़ी है।
क्रियाविधि के सन्दर्भ में, हम उन परिणामों पर विचार करते हैं जो स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के साथ जुड़ाव को दर्शाते हैं। क्या उत्तरदाता पिछले तीन महीनों में स्वास्थ्य सेवा कर्मियों से मिले हैं? क्या उनके पास स्वास्थ्य बीमा है? क्या उन्हें किसी चिकित्सा प्रक्रिया (नसबंदी) के दुष्प्रभावों से निपटने के बारे में जानकारी दी गई थी? और क्या उन्हें लगता है कि इस चिकित्सा प्रक्रिया के बाद उन्हें जो देखभाल मिली, वह पर्याप्त थी? प्राप्त परिणाम दर्शाते हैं कि भाषाई बाधाओं का सामना करने वाली महिलाएँ स्वास्थ्य सेवा प्रणाली से कम जुड़ती हैं और जब वे जुड़ती हैं, उन्हें कम संतोषजनक परिणाम मिलते हैं।
दूसरा माध्यम मीडिया के माध्यम से जन स्वास्थ्य संबंधी जानकारी प्राप्त करना है। हम बढती भाषाई दूरी (एलडी) के प्रभाव का अनुमान इस बात से लगाते हैं कि किसी महिला ने रेडियो, टेलीविजन और समाचार पत्रों के माध्यम से परिवार नियोजन के तरीकों के बारे में सुना है या नहीं। चूँकि इन माध्यमों के लिए संचार की भाषा मुख्यतः प्रचलित भाषा ही होती है, इसलिए हमारे नतीजों से कुछ ऐसे सबूत मिलते हैं कि जो महिलाएं यह भाषा अच्छी तरह नहीं बोल पातीं, उनके द्वारा यह जानकारी प्राप्त करने की सम्भावना कम होती है।
तीसरा माध्यम महिलाओं की व्यक्तिगत स्वायत्तता में अंतर है। क्योंकि परिवार जिले की मूल भाषा बोलने वाली उन महिलाओं की तुलना में, उन महिलाओं के आवागमन पर अधिक प्रतिबंध लगा सकते हैं जो स्थानीय भाषा से कम परिचित हैं। हम स्वायत्तता के कई तरीकों पर विचार करते हैं। जैसे-जैसे भाषाई दूरी (एलडी) एक इकाई बढ़ती है। हम पाते हैं कि महिला को अकेले या किसी के साथ चिकित्सा सहायता प्राप्त करने की अनुमति मिलने की सम्भावना क्रमशः 0.8 और 1.8 पीपी कम हो जाती है। सामान्यतः भाषाई दूरी (एलडी) बढ़ने पर महिलाओं का आवागमन कम हो जाता है। भाषाई दूरी (एलडी) में एक इकाई की वृद्धि होती है तो महिलाओं को अकेले चिकित्सा केंद्र में जाने की अनुमति मिलने की सम्भावना 6.4 पीपी कम हो जाती है, अकेले गांव के बाहर जाने की सम्भावना 4.4 पीपी कम हो जाती है और अकेले बाज़ार जाने की सम्भावना 6.9 पीपी कम हो जाती है। कुल मिलाकर, हमें प्राप्त परिणाम इस बात का प्रमाण देते हैं कि भाषाई दूरी (एलडी) कई मोर्चों पर स्वास्थ्य सेवा तक पहुँचने में बाधा उत्पन्न करती है।
इसके अतिरिक्त, हम किसी ज़िले में अमीरी और रहने के समय जैसी पारिवारिक विशेषताओं के हिसाब से अलग-अलग असर का पता लगाते हैं। हम पाते हैं कि पारिवारिक धन में वृद्धि और ज़िले में किसी परिवार के निवास के वर्षों की संख्या बच्चों के स्वास्थ्य परिणामों पर भाषाई अंतर के नकारात्मक प्रभावों को कम करती है। इससे पता चलता है कि भाषाई अंतर का प्रभाव अमीरों की तुलना में गरीबों पर अधिक पड़ता है। इसलिए चूँकि गरीबों द्वारा सब्सिडी वाली सार्वजनिक सेवाओं का उपयोग करने की सम्भावना अधिक होती है, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं द्वारा भाषाई अंतर को दूर करने में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की ज़रूरत है।
अंत में, हम किसी जिले की जातीय-भाषाई विविधता के अलग-अलग असर पर विचार करते हैं और यह भी देखते हैं कि राज्य में औसत आय देश के औसत से ऊपर है या नीचे। हम पाते हैं कि अपेक्षाकृत अधिक भाषाई रूप से विविध ज़िलों में रहने वाले व्यक्तियों के सन्दर्भ में भाषाई अंतर के प्रतिकूल प्रभाव कम होते हैं, जबकि कम भाषाई रूप से विविध ज़िलों में रहने वाले व्यक्तियों के सन्दर्भ में भाषाई अंतर के प्रतिकूल प्रभाव कम होते हैं। इसका एक कारण यह हो सकता है कि जिन जिलों में भाषा की विविधता ज़्यादा होती है, वे स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में भाषा की रुकावटों से निपटने के लिए बेहतर तरीके से तैयार होते हैं, जिससे बच्चों के स्वास्थ्य के नतीजे बेहतर होते हैं। इसी प्रकार, हम पाते हैं कि कम आय वाले राज्यों में बच्चों के टीकाकरण पर भाषाई अंतर का प्रतिकूल प्रभाव काफी अधिक है। संक्षेप में, जिन राज्यों की आय ज़्यादा है और उनकी सार्वजनिक सेवाओं के प्रबंधन की अच्छी क्षमता है, वे भाषाई बाधाओं का सामना करने वाले लोगों को कुछ प्रकार की स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में बेहतर सक्षम होते हैं।
निष्कर्ष
हमारा शोध मानव पूँजी संचय पर, विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवा प्रणाली तक पहुँच के माध्यम से, भाषाई दूरी (एलडी) के प्रतिकूल प्रभावों संबंधी साहित्य में योगदान देता है। भाषा सीखना सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिशीलता का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसी समावेशी नीतियों का डिज़ाइन जो अलग-अलग भाषा वाले लोगों को सरकार के साथ पूरी तरह से जुड़ने का मौका दे, स्वास्थ्य और विकास के अन्य सामाजिक-आर्थिक संकेतकों में असमानताओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हमें प्राप्त परिणाम दर्शाते हैं कि नीति-निर्माताओं को अपने स्वास्थ्य सेवा आउटरीच कार्यक्रमों में भाषाई रूप से विविध समूहों को शामिल करने की दिशा में अधिक प्रयास करने चाहिए ताकि उनके स्वास्थ्य परिणामों में सुधार हो सके। वैकल्पिक रूप से, व्यक्तियों को प्रमुख भाषाओं को अधिक आसानी से सीखने में सक्षम बनाने से नई भाषाएँ सीखने की लागत भी कम हो सकती है और भाषाई दूरी (एलडी) के प्रतिकूल प्रभावों को कम किया जा सकता है। यह भारत जैसे भाषाई रूप से विविधता वाले देशों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहाँ देश के अंदर बड़ी संख्या में लोग एक स्थान से दूसरे स्थान तक आते-जाते रहते हैं।
अंग्रेज़ी के मूल लेख और संदर्भों की सूची के लिए कृपया यहां देखें।
लेखक परिचय :
अद्वैत जयकुमार कॉलंबिया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के स्नातक छात्र हैं। उनकी शोध रुचि विकास अर्थशास्त्र में है। उन्होंने अशोका विश्वविद्यालय से 2023 में अर्थशास्त्र और वित्त में स्नातक (ऑनर्स) और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया है। अनीशा शर्मा अशोका विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। उनकी शोध रुचियाँ विकास अर्थशास्त्र, श्रम अर्थशास्त्र, फर्म और सार्वजनिक नीति के क्षेत्र में हैं। उन्होंने 2016 में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। इससे पहले, उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड से वित्तीय अर्थशास्त्र (2008) में एमएससी और विकास के लिए अर्थशास्त्र (2009) में एमएससी की उपाधि प्राप्त की, जहाँ वे रोड्स स्कॉलर थीं और दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफ़ंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में बीए (ऑनर्स) (2007) की उपाधि प्राप्त की।
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27 November, 2025 






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