उत्पादकता तथा नव-प्रवर्तन

भारत के डेटा कर्मचारी : मनुष्य परिश्रम से मशीनों का सीखना

  • Blog Post Date 16 अक्टूबर, 2025
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Neha Arya

Indian Institute of Technology Delhi

huz208211@hss.iitd.ac.in

प्रौद्योगिकी में तरक्की से कर्मचारियों को मौजूदा काम से हटाया जा सकता है, साथ ही नए काम का सृजन भी हो सकता है। इस प्रगति ने जनसांख्यिकीय परिवर्तनों और व्यापक आर्थिक उतार-चढ़ावों के साथ, ग़ैर-मानक रोज़गार में भी वृद्धि को बढ़ावा दिया है। इन रुझानों के बीच, नेहा आर्य ने भारत की गिग और प्लेटफ़ॉर्म अर्थव्यवस्था में कार्यरत "डेटा कर्मचारियों" पर प्रकाश डाला है। वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) प्रणालियों से मानव श्रम पर पड़ने वाले प्रभाव पर ध्यान देते हुए, वैश्विक एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं में एक प्रमुख देश के रूप में भारत के भविष्य के बारे में विचार-विमर्श करती हैं।

तकनीकी प्रगति व्यक्तियों, फर्मों, सरकारों और इन समूहों के बीच आदान-प्रदान के मॉडल को नया रूप देती है। ये परिवर्तन अक्सर श्रम बाज़ार की कई गतिशीलता के साथ-साथ कार्य की मौलिक प्रकृति को भी प्रभावित करते हैं। लिन (2011) ने 1965-2000 की अवधि के ऐतिहासिक अमेरिकी जनगणना डेटा (जिसमें व्यावसायिक पदनामों के शब्दकोश का उपयोग किया गया था) का उपयोग करके व्यवसाय के नए पदनाम दिखाए, उदाहरण के लिए, "वेब डेवलपर", "चैट रूम होस्ट" और "रेडियोफार्मासिस्ट"। लिन के दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए, ऑटोर एवं अन्य (2021) ने पाया कि वर्ष 2018 में 60% से अधिक रोज़गार ऐसे पदों के तहत थे जो वर्ष 1940 में मौजूद नहीं थे। हालांकि, स्वचालन जैसी तकनीक, जहाँ श्रमिकों को मौजूदा नौकरियों या कार्यों से विस्थापित कर सकती है, वहीं यह नए काम का सृजन भी करती है, जिससे विशिष्ट विशेषज्ञता वाले कर्मचारियों की माँग फिर से बढ़ जाती है (ऐसमोग्लू और रेस्ट्रेपो 2018)। इन नए व्यावसायिक पदनामों की पहचान करना भारत जैसे विकासशील देशों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिनके पास एक बड़ा, अनौपचारिक और कमज़ोर कार्यबल है और जो तेज़ी से तकनीकी प्रगति के अनुभव से गुज़र रहे हैं।

तकनीकी नवाचारों, जनसांख्यिकीय परिवर्तनों और व्यापक आर्थिक उतार-चढ़ावों ने दुनिया भर में ग़ैर-मानक रोज़गार (एनएसई) के कई रूपों को बढ़ावा दिया है। इनमें अंशकालिक/ऑन-कॉल कार्य, अस्थाई एजेंसी कार्य/बहु-पक्षीय रोज़गार व्यवस्थाएँ, छिपा हुआ रोज़गार1/आश्रित स्व-रोज़गार2 शामिल हैं (अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन- आईएलओ, 2016)। कोविड-19 महामारी ने इस प्रवृत्ति को और तेज़ कर दिया है। विकासशील देशों ने, जहाँ आकस्मिक रोज़गार का उच्च स्तर है, भी रोज़गार की प्रकृति में इस बदलाव का अनुभव किया है। वर्ष 2019 में हुए एक वैश्विक सर्वेक्षण में पाया गया कि 80% उत्तरदाताओं ने लचीले कार्य अवसरों को प्राथमिकता दी और 65% व्यवसायों ने इस तरह के लचीलेपन से लागत-दक्षता में वृद्धि के बारे में बताया (अंतर्राष्ट्रीय कार्यस्थल समूह- आईडब्ल्यूजी, 2019)। भारत का फ्लेक्सी-स्टाफिंग उद्योग वर्ष 2023-24 के दौरान 15.3% बढ़ा, जो मुख्य रूप से एफएमसीजी (फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स), ई-कॉमर्स, मैन्युफैक्चरिंग, हेल्थकेयर, रिटेल, लॉजिस्टिक्स, बैंकिंग और ऊर्जा क्षेत्रों (इंडियन स्टाफिंग फेडरेशन- आईएसएफ), 2024) के कारण है। यह वृद्धि खासकर गिग और प्लेटफ़ॉर्म अर्थव्यवस्था के तेज़ी से विस्तार के मद्देनज़र बढ़ती अनौपचारिकता और असुरक्षित रोज़गार को लेकर चिंताएँ पैदा करती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पीछे मानव श्रम

भारत की गिग और प्लेटफ़ॉर्म अर्थव्यवस्था से जुड़े व्यापक मुद्दों को महत्त्व मिला है, जबकि "डेटा वर्कर्स" (नया काम जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस- एआई सिस्टम के लिए महत्वपूर्ण है) की उभरती हुई श्रेणी को इस चर्चा में काफी हद तक नज़रअंदाज़ किया गया है। चूंकि एआई शब्द को वर्ष 1956 में कंप्यूटर वैज्ञानिकों (मैकार्थी, मिंस्की, रोचेस्टर और शैनन) के एक समूह द्वारा गढ़ा गया था, इसने काम के भविष्य के सन्दर्भ में आशा, भय और अनिश्चितता भरा माहौल पैदा किया है। कई प्रयासों के बाद, चल रही एआई क्रांति अब एआई नेतृत्व के लिए वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना कर रही है। जेनरेटिव एआई (जेनएआई) मॉडल तेज़ी से लोकप्रिय हो रहे हैं, जैसे ओपनएआई का चैटजीपीटी जो 2.5 महीने के भीतर 10 करोड़ मासिक सक्रिय उपयोगकर्ताओं के साथ इतिहास में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला वेब एप्लिकेशन बन गया और कम समय में 50 करोड़ उपयोगकर्ताओं तक पहुँच गया (हादी और नज्म 2023, पेरिस 2025)। "जेनरेटिव" शब्द इस तथ्य को रेखांकित करता है कि ये एआई प्रणालियाँ बिना किसी मानवीय इनपुट के स्वायत्त रूप से नई सामग्री का निर्माण या उत्पादन कर सकती हैं (फ्यूएरिएगेल एवं अन्य 2023)। हालांकि, इन एआई प्रणालियों के विकास में भारी मात्रा में मानव श्रम की ज़रूरत पड़ती है। इनमें से कई एआई प्रणालियाँ (जिनमें चैटजीपीटी, गूगल का जेमिनाइ, डाल- आदि शामिल हैं) एक जटिल "ह्यूमन-इन-द-लूप" (एचआईटीएल) मॉडल पर आधारित हैं (रानी और धीर 2024)। एचआईटीएल में मशीन लर्निंग मॉडल (आईबीएम, 2025) को प्रशिक्षित करने के लिए कच्चे डेटा (जैसे टेक्स्ट फ़ाइलें, आकृति या वीडियो) के एनोटेशन, लेबलिंग और वर्गीकरण के लिए मानव डेटा कर्मचारियों के निर्णय का उपयोग करता है। डेटा क्यूरेटर, लेबलर, कंटेंट मॉडरेटर, सत्यापनकर्ता और मानव फ़ीडबैक प्रदाता यह सुनिश्चित करने के लिए काम करते हैं कि एआई खराब या खतरनाक प्रदर्शन न करे (उदाहरण के लिए, स्वचालित कारों में)। इन आँकड़ों की सटीकता एआई मॉडल की दक्षता और बेहतर पूर्वानुमान/प्रदर्शन के लिए महत्वपूर्ण है। इस प्रकार, डेटा कर्मी एआई प्रणालियों की रीढ़ हैं, जो उनकी कार्यक्षमता, सटीकता और सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। विडंबना यह है कि वे स्वयं अनिश्चित, खंडित और अक्सर अदृश्य स्थितियों में काम करते हैं।

भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण समकालीन और भविष्य की चिंता क्यों है? लागत-दक्षता लक्ष्यों को पूरा करने के लिए, व्यवसाय तेज़ी से एआई आपूर्ति श्रृंखला में गिग कर्मचारियों पर निर्भर हो रहे हैं– अक्सर डिजिटल श्रम प्लेटफार्मों (डीएलपी) या डेटा कर्मियों को नियुक्त करने वाली छोटी फर्मों के माध्यम से क्राउड वर्कर्स को कार्य आउटसोर्स करते हैं। उदाहरण के लिए, वर्ष 2006 में अमेज़न के मैकेनिकल टर्क या एमटर्क (एक आभासी श्रम बाज़ार/क्राउडवर्क प्लेटफ़ॉर्म) की घोषणा के समय, अमेज़न के सीईओ जेफ बेज़ोस ने इसे "आर्टिफिशियल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस”" कहा था। इसका अर्थ था कि प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध "ह्यूमन इंटेलिजेंस टास्क" (एचआईटी) माइक्रोटास्क (अक्सर सरल और दोहराव वाले) कार्य थे जिन्हें सस्ते श्रम वाले एक आरक्षित समूह द्वारा किया जाना था।

एक परियोजना (जिया डेंग एवं अन्य द्वारा) के लिए एमटर्क (जिसे 'टर्कर्स' कहा जाता है) का उपयोग करने वाले डेटा कर्मियों का एक प्रमुख परिणाम, वर्ष 2009 में इमेजनेट डेटासेट का जारी होना था, जो लार्जेस्ट लेबल्ड इमेज डेटासेट था। यह दुनिया भर के लाखों श्रमिकों के काम से प्रेरित था, जिन्होंने बहुत कम वेतन पर लाखों छवियों को मैन्युअल रूप से लेबल किया। प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा 2016 में अमेरिका के लगभग 3,000 टर्कर्स पर किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला कि 50% से ज़्यादा कर्मचारियों की प्रति घंटा कमाई 5 डॉलर से कम थी (प्यू, 2016)। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है अधिकांश डेटा कर्मचारी ग्लोबल साउथ में है, जहाँ वेतन काफ़ी कम है। उदाहरण के लिए, केन्या में, डेटा कर्मचारियों को ज़्यादातर केवल 2 अमेरिकी डॉलर प्रति घंटे का वेतन मिलता है, जबकि अर्जेंटीना में यह वेतन 1.7 अमेरिकी डॉलर जितना कम है। इसके अलावा, कंपनियाँ अक्सर कर्मचारियों को ग़ैर-प्रकटीकरण समझौतों (एनडीए) के अधीन रखती हैं, जिससे एआई प्रणालियों में उनका योगदान और भी कम नज़र आता है (डचविट्ज़ 2024)। कम वेतन के अलावा, कंटेंट मॉडरेशन में लगे डेटा कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की भी चिंताएँ जताई गई हैं। कंटेंट मॉडरेटर नियमित रूप से आघात पहुँचाने वाली सामग्री के संपर्क में आते हैं, जिसके दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक परिणाम होते हैं- कभी-कभी तो यह नशीली दवाओं पर निर्भरता का कारण भी बन जाता है (गेब्रेकिडन 2025)।

वैश्विक एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका

यूरोपीय आयोग के अनुसार, 2011-2019 की अवधि के दौरान भारत ने डिजिटलीकरण की सबसे तेज़ दरों (11%) में से एक दर्ज की, जो चीन के बराबर थी, जिससे श्रम सर्वेक्षणों द्वारा उपयोग किया जाने वाला राष्ट्रीय औद्योगिक वर्गीकरण (एनआईसी) (2008) अधिकांश डिजिटल रूप से संचालित नए कार्यों को शामिल करने के लिए बहुत पुराना हो गया। तो फिर, गिग, प्लेटफ़ॉर्म और डेटा कर्मियों को कहाँ शामिल किया गया? भारत के वार्षिक आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) में राष्ट्रीय व्यवसाय वर्गीकरण (एनसीओ) (2015) का उपयोग किया गया, जिसमें "डेटा एंट्री क्लर्क" को "फॅमिली 4132" (आकृति-1) द्वारा शामिल किया जाता है। अनिवार्य रूप से, श्रेणियों में पारंपरिक लिपिक डेटा इनपुट भूमिकाएं शामिल हैं और आधुनिक एआई-संबंधित डेटा कार्य को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया जाता है। इसलिए, कुल मिलाकर, ये कर्मचारी सांख्यिकीय रूप से नज़र नहीं आते हैं, जैसा कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म-आधारित गिग कर्मचारियों के मामले में होता है।

एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं में प्लेटफ़ॉर्म गिग और डेटा कार्य, प्रौद्योगिकी के "पुनर्स्थापना प्रभाव" (ऐसमोग्लू और रेस्ट्रेपो 2019) के प्रमुख वर्तमान उदाहरण हैं। डेटा सत्यापन और डेटा एनोटेशन जैसी डेटा कार्य से जुड़ी भूमिकाओं के लिए नौकरी के विज्ञापन (नीचे आकृतियों-2, 3 और 4 देखें) में, डेटा विश्लेषण, उत्कृष्ट लिखित और मौखिक संचार कौशल, विवरण पर ध्यान, आदि सहित प्रमुख दक्षताओं को सूचीबद्ध किया जाता है। आकृति-5 में भारत में डेटा कर्मचारियों की बढ़ती मांग को दर्शाया है (जो अब डेटा एनोटेशन के लिए एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रहा है), जिसमें विविध कार्यबल द्वारा संचालित, वैश्विक उपयोग के लिए उच्च-गुणवत्ता वाले डेटासेट को दर्शाया है। इकोनॉमिक टाइम्स की इस रिपोर्ट (टीमलीज़ के आँकड़ों का हवाला देते हुए) के अनुसार, 2024 में, अनुमानित 50,000 भारतीय (फ्रीलांस) एनोटेटर अंतरराष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूद थे, और भारत में 20,000 पूर्णकालिक एनोटेटर थे।

इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डेटा एनोटेशन का वैश्विक बाज़ार अनुमानित 8.22 बिलियन अमेरिकी डॉलर का है और 2028 तक इसके लगभग 26.2% वार्षिक दर से तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद है। वर्ष 2020-21 के 250 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर, भारत द्वारा वर्ष 2030 तक वैश्विक एनोटेशन बाज़ार में 7 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की सेवा प्रदान करने की उम्मीद है (नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ सॉफ़्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज़ (नैसकॉम, 2021)। यहाँ तक ​​कि भारत की 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए राष्ट्रीय रणनीति' डेटा एनोटेशन कार्य की पहचान "कार्यबल के एक बड़े हिस्से को समाहित करने की क्षमता के रूप में करती है जो बढ़ते स्वचालन के कारण खुद को अनावश्यक महसूस कर सकते हैं" (नीति आयोग, 2018)। लेकिन, अन्य मुद्दों के अलावा, एक चिंता यह है कि एचआईटीएल मॉडल एआई सिस्टम को प्रशिक्षित करने या सुधारने के लिए दोहराए जाने वाले कार्यों को करने वाले कर्मियों की संभावित कौशल-हानि (डी-स्किलिंग) का कारण बन सकता है। इसके अतिरिक्त, जबकि स्थान-आधारित गिग कार्य ने सामूहिक प्रयासों (तिवारी 2025, जैन 2025, एलिजाबेथ 2024) के माध्यम से विनियामक3 ध्यान आकर्षित किया है, जिसे अक्सर अनौपचारिक श्रमिक संघों और व्यापक सार्वजनिक चर्चाओं द्वारा समर्थन मिलता है, और एआई डेटा कार्यकर्ता मुख्यधारा की चर्चा में काफी हद तक नहीं रहते हैं।

आकृति-1. एनसीओ-2015 के 'फॅमिली 4132- डेटा एंट्री क्लर्क' समूह के अंतर्गत पदनाम

समूह कोड

व्यवसाय का नाम

विवरण

4132.0401

डेटा एंट्री मशीन ऑपरेटर

कंप्यूटर में वर्णमाला, अंकीय या प्रतीकात्मक डेटा दर्ज करता है और उसका सत्यापन करता है।

4132.0402

घरेलू डेटा एंट्री ऑपरेटर

क्लाइंट या कार्यालय स्थलों पर इलेक्ट्रॉनिक रूप से डेटा (दैनिक/प्रति घंटा कार्य रिपोर्ट) दर्ज करता है।

4132.0600

कोडिंग मशीन ऑपरेटर

विभिन्न सामग्रियों पर कोड प्रिंट करने के लिए कोडिंग मशीनों का उपयोग करता है।

4132.0800

डुप्लिकेटिंग मशीन ऑपरेटर/फोटोकॉपियर

फोटोकॉपी मशीनों का संचालन और निगरानी करता है।

4132.0900

एम्बॉसिंग मशीन ऑपरेटर

विद्युत चालित एम्बॉसिंग मशीनों का संचालन करता है।

4132.1000

एड्रेसिंग मशीन ऑपरेटर

विद्युत चालित प्रिंटिंग मशीनों का संचालन करता है।

4132.1300

बुककीपिंग मशीन ऑपरेटर

कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर का उपयोग करके व्यावसायिक लेनदेन रिकॉर्ड करता है और सामान्य लिपिकीय कर्तव्यों का पालन करता है।

4132.1400

बिल प्रोसेसिंग क्लर्क

कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर का उपयोग करके बिल, विवरण तैयार करता है, वेतन-पत्र और अन्य राशियों की गणना करता है।

4132.9900

डेटा एंट्री क्लर्क, अन्य

अन्यत्र वर्गीकृत न की गई बहीखाता और कंप्यूटिंग मशीनों का संचालन करता है

आकृति-2. डेटा लेबलिंग- स्थाई


आकृति-3. डेटा एनोटेटर- स्वतंत्र

आकृति-4. वर्गीकरण डेटा एनोटेशन- स्वतंत्र


आकृति-5. डेटा कर्मचारियों की मांग

नीति संबंधी निर्देश

हालांकि भारत 2018-2023 के दौरान 1.4% की हिस्सेदारी के साथ वैश्विक स्तर पर एआई अनुसंधान में 14वें स्थान पर है, जबकि अमेरिका की हिस्सेदारी 30.4% और चीन की 22.8% है। तथापि, यह पहले से ही एआई तकनीकों के लिए एक वैश्विक बाज़ार के रूप में ध्यान में आ चुका है और हाल ही में चैटजीपीटी के लिए यह दूसरा सबसे बड़ा और वैश्विक स्तर पर सबसे तेज़ी से बढ़ते बाज़ारों में से एक बनकर उभरा है। चूँकि मौजूदा एआई क्रांति का भविष्य में क्या असर होगा, यह सभी के लिए अस्पष्ट है, भारत वैश्विक एआई आपूर्ति श्रृंखला में अपनी भूमिका को आकार देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। एआई की आर्थिक और (ठीक-ठाक) रोज़गार क्षमता का पूरी तरह से लाभ उठाने के लिए, एक समन्वित नीतिगत दृष्टिकोण की आवश्यकता है। हालांकि राष्ट्रीय एआई रणनीति एक खाका (ब्लूप्रिंट) तैयार करती है, लेकिन एआई डेटा-संबंधी नौकरियों (क्राउडसोर्स्ड माइक्रोटास्क कार्य सहित) को शामिल करने के लिए एनसीओ को अद्यतन करना, एआई-केंद्रित कौशल विकास केंद्र स्थापित करना, एआई आपूर्ति श्रृंखला में गिग कार्य को विनियमित करना तथा समान और समावेशी तरीके से एआई-संबंधी अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना बहुत ज़रूरी है। डिजिटल लेबर रजिस्ट्री के माध्यम से ऐसे गिग कार्यों का पता लगाने, श्रमिकों के कौशल विकास को बढ़ावा देने और पूरी श्रृंखला में प्लेटफार्मों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। एआई के अनिश्चित युग में भारत के श्रम बाज़ार में कौशल और नौकरियों के निरंतर ध्रुवीकरण4 (कुरियाकोस और अय्यर 2020) से बचने के लिए सक्रिय उपायों की आवश्यकता है। इसके अलावा, टेक्नोलॉजी में प्रगति और काम के विभाजन की लोकप्रियता के कारण आय में श्रमिकों की हिस्सेदारी में गिरावट (कराबरबौनिस और नीमन 2013) आ रही है, इसके लिए तत्काल नियामक, नागरिक समाज और और कानूनी कार्रवाई की ज़रूरत है। एक मज़बूत, नैतिक एआई वर्कफ़ोर्स बनाने के लिए नवाचार और समावेश दोनों की आवश्यकता है। एआई आपूर्ति श्रृंखला श्रम के एक 'केंद्र' के रूप में, भारत के पास इन डेटा वर्कर्स के लिए लेबर मार्केट की स्थितियों को बेहतर बनाने का मौका और ज़िम्मेदारी दोनों है, जिन्हें उनके द्वारा पैदा किए जाने वाले बड़े फ़ायदों से अलग नहीं किया जाना चाहिए। 

टिप्पणियाँ :

  1. "छिपे हुए रोज़गार" से तात्पर्य ऐसी व्यवस्थाओं से है जहाँ वर्कर स्व-रोज़गार के अनुरूप संविदात्मक व्यवस्था के साथ अपना काम करते हैं।
  2. "आश्रित स्व-रोज़गार" उन व्यक्तियों पर लागू होता है जो बिना कर्मचारियों के व्यवसाय संचालित करते हैं, लेकिन अपने काम पर उनका पूर्ण नियंत्रण नहीं होता है।
  3. राजस्थान प्लेटफ़ॉर्म आधारित गिग वर्कर (पंजीकरण और कल्याण) अधिनियम, 2023; कर्नाटक प्लेटफ़ॉर्म-आधारित गिग वर्कर (सामाजिक सुरक्षा और कल्याण) अधिनियम, 2025; बिहार प्लेटफ़ॉर्म आधारित गिग वर्कर (पंजीकरण, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण) अधिनियम, 2025।
  4. नौकरी ध्रुवीकरण से तात्पर्य मध्यम-कौशल नौकरियों (आमतौर पर नियमित कार्यों से जुड़ी) की घटती हिस्सेदारी से है, जबकि अर्थव्यवस्था के भीतर उच्च-कौशल और निम्न-कौशल दोनों प्रकार की नौकरियों में वृद्धि हो रही है।

अंग्रेज़ी के मूल लेख और संदर्भों की सूची के लिए कृपया यहां देखें।

लेखक परिचय : नेहा आर्य वर्तमान में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग में एक पीएचडी स्कॉलर हैं। उनकी शोध रुचियाँ श्रम बाज़ार पर प्रौद्योगिकी के प्रभाव पर केन्द्रित हैं। वे भारत की विशाल, अपेक्षाकृत युवा आबादी और उच्च बेरोजगारी दर (विशेषकर शहरी क्षेत्रों में) के सन्दर्भ में, गिग और प्लेटफ़ॉर्म अर्थव्यवस्था के भारत के श्रम बाज़ार पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कर रही हैं।  

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